श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.3.111 
आइसे याय लोक हर्षे, नाहि समाधान ।
लोकेर सङ्घट्टे दिन हैल अवसान ॥111॥
 
 
अनुवाद
लोग बड़ी खुशी से आते-जाते थे। दिन खत्म होने से पहले कितने लोग वहाँ जमा हो गए, इसका कोई हिसाब नहीं था।
 
People came and went with great joy. By sunset, there was no count of the number of people gathered there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)