आचार्य कहे - ना करिब सन्न्यासि - निमन्त्रण ।
सन्न्यासी नाशिल मोर सब स्मृति - धर्म ॥101॥
अनुवाद
अद्वैत आचार्य ने उत्तर दिया, "मैं अब कभी किसी अन्य संन्यासी को आमंत्रित नहीं करूंगा, क्योंकि यह संन्यासी ही है जिसने मेरी सभी ब्राह्मणीय स्मृति विधियों को बिगाड़ दिया है।"
Advaita Acharya replied, “Now I will never call any Sanyasi, because one Sanyasi has polluted all my Brahmin Smriti rules.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥