श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  2.25.85 
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाद्मि स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः ।
महीयसां पाद - रजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥85॥
 
 
अनुवाद
"जब तक मानव समाज महान महात्माओं के चरणकमलों की धूलि को स्वीकार नहीं करता - ऐसे भक्त जिनका भौतिक संपत्ति से कोई लेना-देना नहीं है - तब तक मानवजाति कृष्ण के चरणकमलों की ओर अपना ध्यान नहीं लगा सकती। वे चरणकमल भौतिक जीवन की सभी अवांछित, दयनीय स्थितियों का नाश करते हैं।"
 
"Until human society imbibes the dust from the feet of those great souls, or devotees, who have nothing to do with material possessions, man cannot direct his attention toward the feet of Krishna. Those feet destroy all the unwanted, distressing conditions of material life."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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