श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.25.58 
श्री - कृष्ण - चैतन्य - वाणी - अमृतेर धार ।
तिंहो ये कहये वस्तु, सेइ ‘तत्त्व’ - सार ॥58॥
 
 
अनुवाद
"श्री चैतन्य महाप्रभु के वचन अमृत की वर्षा हैं। वे जो भी परम सत्य मानते हैं, वह वास्तव में समस्त आध्यात्मिक ज्ञान का शिखर है।"
 
"The words of Sri Chaitanya Mahaprabhu are a stream of nectar. What he calls the Absolute Truth is actually the essence of all spiritual knowledge."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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