श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.25.56 
ताते छय दर्शन हैते ‘तत्त्व’ नाहि जानि ।
‘महाजन’ येइ कहे, सेइ ‘सत्य’ मानि ॥56॥
 
 
अनुवाद
"छह दार्शनिक सिद्धांतों का अध्ययन करके परम सत्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम महाजनों, अधिकारियों के मार्ग का अनुसरण करें। वे जो कुछ भी कहते हैं, उसे परम सत्य मानकर स्वीकार करना चाहिए।"
 
"The ultimate truth cannot be reached by studying the six philosophical schools. Therefore, it is our duty to follow the path of the great sages. Whatever they say should be accepted as the ultimate truth."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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