श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  2.25.40 
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यज स्त्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥40॥
 
 
अनुवाद
“‘जो लोग मेरे रूप से ईर्ष्या करते हैं, जो क्रूर और दुराचारी हैं और मनुष्यों में सबसे नीच हैं, उन्हें मैं निरंतर नारकीय जीवन में विभिन्न आसुरी योनियों में डालता हूँ।’
 
“Those who envy My form, who are cruel and wicked and the lowest among men, I cast them into various demonic births in a perpetual hellish state.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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