श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 276
 
 
श्लोक  2.25.276 
एइ अमृत अनुक्षण, साधु महान्त - मेघ - गण
विश्वोद्याने करे वरिषण ।
ताते फले अमृत - फल, भक्त खाय निरन्तर
तार शेषे जीये जग - जन ॥276॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण में आए भक्तजन सम्पूर्ण विश्व में अमृतमय भक्ति का वितरण करने का दायित्व लेते हैं। वे उस धरती पर जल बरसाने वाले बादलों के समान हैं जो इस जगत में भगवान के प्रेम रूपी फल को पोषित करती है। भक्तगण उस फल का जी भरकर सेवन करते हैं, और जो कुछ बचता है उसे जनसाधारण खाते हैं। इस प्रकार वे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं।
 
Devotees who have taken refuge at the lotus feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu are responsible for distributing the nectar-like devotion throughout the universe. They are like clouds that pour water on the land that nourishes the fruit of divine love in this world. Devotees eat the fruit to their heart's content, and whatever remains is consumed by ordinary people. Thus, they live happily.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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