श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 206
 
 
श्लोक  2.25.206 
दुःखी वैष्णव देखि’ ताँरे करान भोजन ।
गौड़ीया आइले दधि, भात, तैल - मर्दन ॥206॥
 
 
अनुवाद
सुबुद्धि राय अपनी बचत मथुरा आने वाले बंगाली वैष्णवों को दही खिलाने में खर्च करते थे। वे उन्हें पके हुए चावल भी खिलाते थे और तेल से मालिश भी करते थे। जब वे किसी दरिद्र वैष्णव को देखते, तो वे अपनी कमाई से उसे भोजन कराते थे।
 
Subuddhi Rai used his savings to buy yogurt for Bengali Vaishnavas visiting Mathura. He would give them cooked rice (bhaat) and oil for massage. Whenever he saw a distressed Vaishnava, he would use his money to feed them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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