श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 204
 
 
श्लोक  2.25.204 
शुष्क - काष्ठ आ नि’ राय वेचे मथुराते ।
पाँच छय पैसा हय एक एक बोझाते ॥204॥
 
 
अनुवाद
सुबुद्धि राय जंगल से सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा करते और उन्हें मथुरा शहर में बेचने ले जाते। हर लट्ठे के बदले उन्हें पाँच या छह पैसे मिलते थे।
 
Subuddhi Rai would collect dry wood from the forest and sell it in Mathura city. He would earn five or six paise for each load.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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