श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  2.25.161 
एइ श्लोकेर अर्थ प्रभु ‘एकषष्टि’ प्रकार ।
करियाछेन, याहा शुनि’ लोके चमत्कार ॥161॥
 
 
अनुवाद
महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण ने कहा कि श्री चैतन्य महाप्रभु उस श्लोक की व्याख्या पहले ही इकसठ प्रकार से कर चुके हैं। यह सुनकर सभी आश्चर्यचकित हो गए।
 
The Maharashtrian Brahmin explained that Sri Chaitanya Mahaprabhu had interpreted this verse 61 times. Hearing this, everyone was astonished.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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