श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  2.25.158 
तस्यारविन्द - नयनस्य पदारविन्द - किञ्जल्क - मिश्र - तुलसी - मकरन्द - वायुः ।
अन्तर्गतः स्व - विवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षर - जुषामपि चित्त - तन्वोः ॥158॥
 
 
अनुवाद
“‘जब भगवान के कमल-नयन वाले चरण कमलों से तुलसी के पत्तों और केसर की सुगंध लेकर वायु उन ऋषियों [कुमारों] के नासिका द्वारा हृदय में प्रवेश करती थी, तो उनके शरीर और मन दोनों में परिवर्तन होता था, यद्यपि वे निराकार ब्रह्म ज्ञान में आसक्त थे।’
 
“When the air carrying the fragrance of Tulsi leaves and saffron from the Lord's lotus feet entered the hearts of those sages (Kumaras) through their nostrils, they experienced disturbances in both their bodies and minds, although they were worshippers of the impersonal Brahman.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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