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श्लोक 2.25.146  |
सर्व - वेदान्त - सारं हि श्रीमद्भागवतमिष्यते ।
तद्रसामृत - तृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥146॥ |
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| अनुवाद |
| श्रीमद्भागवतम् को समस्त वैदिक साहित्य और वेदान्त दर्शन का सार माना जाता है। जो कोई श्रीमद्भागवतम् के दिव्य रस का आस्वादन कर लेता है, वह कभी किसी अन्य साहित्य की ओर आकर्षित नहीं होता। |
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| "The Srimad Bhagavatam is considered the essence of all Vedic literature and Vedanta philosophy. Anyone who savors the divine essence of the Srimad Bhagavatam is never attracted to any other literature." |
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