श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  2.25.134 
एते चांश - कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् ।
इन्द्रारि - व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥134॥
 
 
अनुवाद
"भगवान के ये सभी अवतार या तो पुरुष-अवतारों के पूर्ण अंश हैं या उनके पूर्ण अंशों के अंश हैं। किन्तु कृष्ण स्वयं भगवान हैं। प्रत्येक युग में जब इंद्र के शत्रुओं द्वारा संसार त्रस्त होता है, तब वे अपने विभिन्न रूपों द्वारा जगत की रक्षा करते हैं।"
 
"All these incarnations of God are either complete expansions of the Purusha incarnations or parts (kalas) of the complete expansions. But Krishna himself is the Supreme Personality of Godhead. He protects the world in his various forms in every age when it is afflicted by the enemies of Indra.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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