श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  2.25.117 
यैछे सूर्येर स्थाने भासये ‘आभास’ ।
सूर्य विना स्वतन्त्र तार ना हय प्रकाश ॥117॥
 
 
अनुवाद
'कभी-कभी सूर्य के स्थान पर सूर्य का प्रतिबिंब अनुभव किया जाता है, लेकिन इसका प्रकाश सूर्य से स्वतंत्र कभी संभव नहीं होता है।
 
Sometimes the reflection of the sun is experienced instead of the sun itself, but sunlight can never be possible independently of the sun.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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