श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  2.25.109 
यावानहं यथा - भावो यदूप - गुण - कर्मकः ।
तथैव तत्त्व - विज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥109॥
 
 
अनुवाद
“ मेरी अहैतुकी कृपा से तुम मेरे व्यक्तित्व, स्वरूप, गुणों और लीलाओं के विषय में सत्य से अवगत हो जाओ।
 
“By my causeless grace, may my personality, various rasas, qualities and pastimes all be revealed in you.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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