श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.24.99 
‘दुःसङ्ग’ कहिये - ‘कैतव’, ‘आत्म - वञ्चना’ ।
कृष्ण, कृष्ण - भक्ति विनु अन्य कामना ॥99॥
 
 
अनुवाद
"खुद को और दूसरों को धोखा देना कैतव कहलाता है। इस प्रकार धोखा देने वालों की संगति दु:संग कहलाती है। जो लोग कृष्ण की सेवा के अलावा अन्य वस्तुओं की इच्छा रखते हैं, उन्हें भी दु:संग कहा जाता है।
 
"Deceiving oneself and others is called kaitava. Associating with such deceivers is called duḥsanga, meaning bad company. Those who desire other things than serving Krishna are also called duḥsanga."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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