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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  2.24.88 
यच्च व्रजन्त्यनिमिषामृषभानुवृत्त्या दूरे - यमा ह्युपरि नः स्पृहणीय - शीलाः ।
भर्तुर्मथः सु - यशसः कथनानुराग - वैक्लव्य - बाष्प - कलया पुलकी - कृताङ्गाः ॥88॥
 
 
अनुवाद
"जो लोग भगवान कृष्ण की लीलाओं की चर्चा करते हैं, वे भक्ति जीवन के सर्वोच्च स्तर पर होते हैं, और उनकी आँखों में आँसू और शारीरिक उल्लास के लक्षण प्रकट होते हैं। ऐसे व्यक्ति योग के नियमों का पालन किए बिना ही कृष्ण की भक्ति करते हैं। उनमें सभी आध्यात्मिक गुण होते हैं, और वे वैकुंठ लोकों में पहुँच जाते हैं, जो हमसे ऊपर हैं।"
 
"Those who discuss the deeds of Lord Krishna attain the highest state of devotion, and their eyes shed tears and physical excitement are visible. Such people worship Krishna without practicing the rituals of the yoga system. They possess all the spiritual qualities and go to the Vaikuntha planets, which are situated above us."
तात्पर्य
यह श्रीमद् भागवतम (3.15.25) का एक उद्धरण है। इस श्लोक में भगवान ब्रह्मा सभी देवताओं से बात कर रहे हैं, जो दिति के गर्भ में दो असुरों से डरते थे। भगवान ब्रह्मा ने वैकुंठ में कुमारों की यात्रा का वर्णन किया, और इसे व्यासदेव के मित्र मैत्रेय ने फिर से समझाया था, जब उन्होंने विदुर को निर्देश दिए थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)