श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  2.24.40 
शास्त्र - युक्ति नाहि इहाँ सिद्धान्त - विचार ।
एइ स्वभाव - गुणे, याते माधुर्येर सार ॥40॥
 
 
अनुवाद
"जब कोई दिव्य स्तर पर कृष्ण के प्रति आकृष्ट होता है, तो प्रकट शास्त्रों के आधार पर कोई तार्किक तर्क-वितर्क नहीं रह जाता, न ही ऐसे निष्कर्षों पर विचार करना पड़ता है। यही उनका दिव्य गुण है जो समस्त दिव्य माधुर्य का सार है।
 
"When one is attracted to Krishna in his transcendental position, no arguments based on scriptures work, nor can any such theories be considered. This is His transcendental quality, which is the essence of all divine sweetness."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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