"औ साध्वी स्त्रियाँ और शुद्ध बुद्धि वाले शूद्र भी तांत्रिक मंत्रों में दीक्षा पाने के अधिकारी हैं।"
इस बात की पुष्टि स्वंय भगवान कृष्ण ने भी भगवद्गीता (9.32) में करते हैं:
"हे पृथा के पुत्र! जो लोग मेरी शरण में आते हैं वे किसी भी निम्न जाति के हों - स्त्री, वैश्य [व्यापारी] या शूद्र [श्रमिक] - वो सभी परम गति को प्राप्त करते हैं।"
यदि कोई वास्तव में कृष्ण की सेवा करना चाहता है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो शूद्र है वैश्य या स्त्री है। यदि कोई तन्मयता पूर्वक हरे कृष्ण महामंत्र या दीक्षा-मंत्र का जाप करना चाहता है तो वो पाञ्चरात्रिक प्रक्रिया के अनुसार दीक्षा लेने का अधिकारी है। हालाँकि, वैदिक सिद्धांतों के अनुसार, केवल एक ब्राह्मण ही जो अपने कर्मों में पूरी तरह से लीन है, उसे दीक्षित किया जा सकता है। शूद्र और महिलाओं को वैदिक दीक्षा नहीं दी जाती। जब तक कोई आध्यात्मिक गुरु के अनुसार योग्य नहीं होता तब तक वो पाँचरात्रिक-विधि या वैदिक-विधि से मंत्र स्वीकार नहीं कर सकता। जिस समय कोई मंत्र स्वीकार करने के लायक होता है उसे पाँचरात्रिक-विधि या वैदिक-विधि से दीक्षित किया जाता है। किसी भी स्थिति में परिणाम समान होता है।
मंत्र-सिद्धि-आदि-शोधन के संबंध में मंत्र की प्रभावशीलता के बारे में श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर सोलह विभाग देते हैं, जिसकी पुष्टि हारी-भक्ति-विलास (1.204 से शुरू) में की गयी है:
"सिद्ध-साध्य-सुसिद्धारि क्रमज ज्ञेयो विचक्षणैः"
ये इस प्रकार है (1) सिद्ध (2) साध्य (3) सुसिद्ध और (4) अरि। इन चार सिद्धांतों को विशिष्ट तौर पर विभाजित किया जा सकता है: (1) सिद्ध-सिद्ध (2) सिद्ध-साध्य (3) सिद्ध-सुसिद्ध (4) सिद्ध-अरि (5) साध्य-सिद्ध (6) साध्य-साध्य (7) साध्य-सुसिद्ध (8) साध्य-अरि (9) सुसिद्ध-सिद्ध (10) सुसिद्ध-साध्य (11) सुसिद्ध-सुसिद्ध (12) सुसिद्ध-अरि (13) अरि-सिद्ध (14) अरि-साध्य (15) अरि-सुसिद्ध (16) अरि-अरि।
जिन लोगों को अठारह अक्षर वाले मंत्र से दीक्षित किया जाता है, उन्हें ऊपर उल्लेखित सोलह विभाजनों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होती। जैसा कि हारी-भक्ति-विलास (1.215, 219, 220) में निषेध किया गया है:
"इसमें शत्रुओं के दोष - नरनस्वादी-विचारण नहीं है"
"ऋक्ष-राशि-विचार भी मन में नहीं करना चाहिए प्रिय"
"इसमें अरि-शुद्धि आदि नारी-मित्रादि-लक्षणों को नहीं सोचना चाहिए"
"सिद्ध-साध्य-सुसिद्धारि - इस रूप में यहाँ कोई विचारण नहीं है।"
मंत्र का शोधन या शुद्धिकरण होता है, लेकिन कृष्ण मंत्र में ऐसा कोई विचार नहीं है। बलित्वात कृष्ण-मंत्राणां संस्कारापेक्षण न हि: "कृष्ण मंत्र इतना शक्तिशाली होता है कि शोधन का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।" (हारी-भक्ति-विलास 1.235)
जहाँ तक दीक्षा का सवाल है, मध्य लीला 15.108 में इसका उल्लेख है। कुल मिलाकर जब किसी व्यक्ति को पाँचरात्रिक-विधि के अनुसार दीक्षित किया जाता है तो वह पहले ही ब्राह्मण के पद को प्राप्त कर लेता है। जैसा कि हारी-भhakti-विलास (2.12) में लिखा है:
"जैसे पारा डालने पर कांसा सोना बन जाता है, उसी प्रकार एक वास्तविक गुरु द्वारा दीक्षित शिष्य तुरंत ब्राह्मण पद प्राप्त कर लेता है।"
जहाँ तक दीक्षा (दीक्षा) के समय की बात है, तो सब कुछ गुरु की स्थिति पर निर्भर करता है। जैसे ही किसी वास्तविक गुरु को संयोग से या किसी कार्यक्रम द्वारा प्राप्त किया जाता है, दीक्षा प्राप्त करने के अवसर का तुरंत लाभ उठाना चाहिए। तत्व-सागर नामक पुस्तक में कहा गया है:
"एक वास्तविक गुरु का संग दुर्लभ होता है और एक बार मिलने पर यदि उनकी अनुमति मिल जाये तो बड़ी दिक्षा का अवसर आ जाता है।"
"चाहे वह गाँव हो वन हो मैदान हो, दिन हो रात हो, यदि संयोग से गुरु आते हैं तो दीक्षा उनकी आज्ञा से ही होती है।"
"जब उनकी इच्छा होती है तभी दीक्षा होती है, गुरु की आज्ञा के अनुसार। न कोई तीर्थ, न कोई व्रत, न कोई धन, न कोई स्नान या जप की क्रिया।"
"सिर्फ उनकी इच्छा से और एक वास्तविक गुरु मिलने पर ही दीक्षा संभव है।"
"यदि संयोग से किसी को सदगुरु मिल जाता है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता जहाँ वह हैं, मंदिर में या जंगल में। यदि सदगुरु, वास्तविक आध्यात्मिक गुरु, सहमत हों तो उचित समय या स्थान का इंतजार किए बिना किसी को तुरंत दीक्षा दी जा सकती है।"
प्रातःस्मृति के संदर्भ में, प्रभु का प्रातःकाल स्मरण, प्रातःकालीन घंटों में (ब्राह्म-मुहूर्त के रूप में जाना जाता है) उठ कर तुरंत हरे कृष्ण मंत्र का जाप करना चाहिए, या कम से कम "कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण।" इस प्रकार कृष्ण का स्मरण करना चाहिए। कुछ श्लोकों या प्रार्थनाओं का भी जाप करना चाहिए। जाप से व्यक्ति तुरंत शुभ और भौतिक गुणों के संक्रमण से परे हो जाता है। वास्तव में व्यक्ति को भगवान कृष्ण का जाप और स्मरण प्रतिदिन चौबीस घंटे या यथासंभव अधिक करना चाहिए:
स्मार्तव्यः सततं विष्णुः विस्मर्तव्यो न जातुचित
सर्वे विधि-निषेधाः स्युः एतयोः एव किंकरः
"कृष्ण भगवान विष्णु के मूल हैं। उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए और कभी भी किसी भी समय नहीं भूलना चाहिए। शास्त्रों में उल्लिखित सभी नियम और निषेध इन दो सिद्धांतों के सेवक होने चाहिए।" यह पद्म पुराण से एक उद्धरण है, जिसे ब्रहत-सहस्र-नाम-स्तोत्र कहा जाता है।
चैतन्य-चरितामृत के वर्तमान छंद में प्रातः-कृत्य शब्द का अर्थ है कि व्यक्ति को नियमित रूप से प्रातःकाल शौच करना चाहिए और फिर स्नान करके खुद को साफ करना चाहिए। व्यक्ति को गरारा (आचमन) करना होगा और अपने दांत साफ करने होंगे (दंत-धावन)। उसे इसे टहनियों या टूथब्रश से करना चाहिए - जो भी उपलब्ध हो। इससे मुंह शुद्ध होगा। फिर स्नान करना चाहिए। वास्तव में गृहस्थों और वानप्रस्थों को दिन में दो बार स्नान करना चाहिए (प्रातर-मध्याह्नयोः स्नानं वानप्रस्थ-गृहस्थयोः)। एक सन्यासी को प्रतिदिन तीन बार स्नान करना चाहिए और एक ब्रह्मचारी दिन में केवल एक बार स्नान कर सकता है। जब भी व्यक्ति पानी से स्नान करने में सक्षम न हो, तो वह हरे कृष्ण मंत्र का जाप करके स्नान कर सकता है। व्यक्ति को अपना संध्यादि-वंदन भी करना होता है - यानी उसे दिन में तीन बार - प्रातः, मध्याह्न और सायं अपने गायत्री मंत्र का जाप करना होता है।
