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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 313
 
 
श्लोक  2.24.313 
अहं वेद्मि शुको वेत्ति व्यासो वेत्ति न वेत्ति वा ।
भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया ॥313॥
 
 
अनुवाद
[भगवान शिव ने कहा:] 'मैं जान सकता हूँ; व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी जान सकते हैं; और व्यासदेव श्रीमद्भागवतम् को जान सकते हैं या नहीं भी जान सकते हैं। कुल मिलाकर, श्रीमद्भागवतम्, जो कि निष्कलंक पुराण है, केवल भक्ति के माध्यम से ही सीखा जा सकता है, भौतिक बुद्धि, अटकलबाज़ी या काल्पनिक टीकाओं से नहीं।'”
 
"[Lord Shiva said:] 'Either I know the Srimad Bhagavatam or Sukadeva Gosvami, the son of Vyasa, knows it, and Vyasadeva knows it or he does not. This immaculate Purana, Srimad Bhagavatam, can be learned only through devotion—not through material intellect, contemplative methods, or imaginary commentaries.'
तात्पर्य
भक्ति सेवा में नौ प्रक्रियाएँ शामिल हैं, जिसकी शुरुआत भगवान विष्णु की गतिविधियों को सुनने, जपने और याद करने से होती है। केवल वही व्यक्ति जो भक्ति सेवा में लगा हुआ है, श्रीमद्-भागवतम को समझ सकता है, जो कि एक पारमार्थिक (परमहंस) के लिए निर्मल पुराण है। इस उद्देश्य के लिए तथाकथित कट्टरियाँ बेकार हैं। वैदिक निषेधाज्ञा के अनुसार, यस्या दवे परा भक्तिर यथा दवे तथा गुरु। सभी वैदिक साहित्य बताते हैं कि श्रीमद्-भागवतम को भगवत व्यक्ति से सीखना होगा, और इसे समझने के लिए शुद्ध भक्ति सेवा में संलग्न होना होगा। श्रीमद्-भागवतम को तथाकथित विद्वान विद्वानों या व्याकरणविदों द्वारा नहीं समझा जा सकता है। जिसने शुद्ध कृष्ण चेतना को विकसित किया है और शुद्ध भक्त की सेवा की है, आध्यात्मिक गुरु, श्रीमद्-भागवतम को समझ सकता है। अन्य नहीं कर सकते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)