श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 305
 
 
श्लोक  2.24.305 
“उरुक्रमे एव भ क्तिमेव अहैतुकीमेव कुर्वन्त्येव” ॥305॥
 
 
अनुवाद
"एव" शब्द में बार-बार 'उरुक्रम', 'भक्ति', 'अहैतुकी' और 'कुर्वन्ति' शब्द जुड़ते हैं। इस प्रकार एक और अर्थ स्पष्ट होता है।"
 
“The words ‘Urukram,’ ‘Bhakti,’ ‘Ahaituki’ and ‘Kurvanti’ are repeatedly combined with ‘Eva’. In this way another meaning emerges.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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