श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 303
 
 
श्लोक  2.24.303 
सर्व - समुच्चये आर एक अर्थ हय ।
‘आत्मारामाश्च मुनयश्च निर्ग्रन्थाश्च’ भजय ॥303॥
 
 
अनुवाद
"सभी शब्दों को एक साथ लेने पर, एक और अर्थ निकलता है। चाहे कोई आत्माराम हो, कोई महान ऋषि हो या निर्ग्रन्थ हो, सभी को भगवान की सेवा में लगना चाहिए।
 
"Taken together, the words have another meaning. Whether one is an Atmaram, a Muni, or a Nirgrantha, everyone should serve the Lord."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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