श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 302
 
 
श्लोक  2.24.302 
‘निर्ग्रन्था ए व’ हञा, ‘अपि’ - निर्धारणे ।
एइ ‘ऊनषष्टि’ प्रकार अर्थ करि लुँ व्याख्याने ॥302॥
 
 
अनुवाद
“तब मैंने ‘निर्ग्रन्थः’ शब्द लेकर और ‘अपि’ को जीविका के अर्थ में लेकर श्लोक का उनसठवाँ अर्थ समझाने का प्रयास किया है।
 
“Then, taking the word ‘Nirgrantha’ and ‘Ani’ in the sense of confirming, I have tried to explain the sixty-ninth meaning of this word.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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