| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ » श्लोक 281 |
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| | | | श्लोक 2.24.281  | नारद कहे , - ‘ऐछे रह, तुमि भाग्यवान्’ ।
एत ब लि’ दुइ - जन हइला अन्तर्धान ॥281॥ | | | | | | | अनुवाद | | “नारद मुनि ने उनके प्रतिदिन भोजन से अधिक कुछ न चाहने की बात को स्वीकार किया और उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘तुम भाग्यशाली हो।’ इसके बाद नारद मुनि और पर्वत मुनि उस स्थान से अंतर्ध्यान हो गए। | | | | “Narada Muni agreed not to desire more than a day's supply of food and blessed him saying, 'You are fortunate.' Thereupon Narada Muni and Parvat Muni disappeared from that place.” | | ✨ ai-generated | | |
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