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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 272
 
 
श्लोक  2.24.272 
नारद कहे , - “व्याध, एइ ना हय आश्चर्य ।
हरि - भक्त्ये हिंसा शून्य हय साधु - वर्य ॥272॥
 
 
अनुवाद
नारद मुनि बोले, 'हे मेरे शिकारी, ऐसा व्यवहार बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है। भक्ति में लीन व्यक्ति स्वतः ही अहिंसक हो जाता है। वह सज्जनों में सर्वश्रेष्ठ होता है।'
 
"Narada Muni said, 'O hunter, such behavior is not at all surprising. In devotion, a person automatically becomes non-violent. He is the best among saints.'
तात्पर्य
इस श्लोक में 'साधु-वर' शब्द का अर्थ है 'सज्जनो में श्रेष्ठ'। वर्तमान समय में बहुत-से कथित सज्जन हैं जो पशुओं और पक्षियों को मारने में निपुण हैं। फिर भी, ये कथित सज्जन एक ऐसे धर्म का दावा करते हैं जिसमें मारना सख्त मना है। नारद मुनि और वैदिक संस्कृति के अनुसार, पशुओं को मारने वाले तो सज्जन भी नहीं हैं, धार्मिक होने की तो बात ही छोड़िए। एक धार्मिक व्यक्ति, भगवान का भक्त, अहिंसक होना चाहिए। यही एक धार्मिक व्यक्ति का स्वभाव है। हिंसक होना और एक ही समय में खुद को धार्मिक व्यक्ति कहना विरोधाभासी है। नारद मुनि और शिष्य परंपरा इस तरह के पाखंड को स्वीकार नहीं करती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)