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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 257
 
 
श्लोक  2.24.257 
व्याध कहे, - ‘धनुक भाङ्गिले वर्तिब केमने?’ ।
नारद कहे , - ‘आमि अन्न दिब प्रति - दिने’ ॥257॥
 
 
अनुवाद
शिकारी ने उत्तर दिया, 'यदि मेरा धनुष टूट गया तो मैं अपना भरण-पोषण कैसे कर पाऊंगा?'
 
The hunter replied, 'If I break my bow, how will I feed myself?' Sage Narada replied, 'Don't worry. I will give you food every day.'
तात्पर्य
“नारद मुनि ने उत्तर दिया, 'चिंता न करें। मैं हर दिन आपके लिए पूरा भोजन उपलब्ध कराऊंगा।'

वास्तव में हमारी आय का स्रोत हमारी आजीविका का स्रोत नहीं है। प्रत्येक जीवित प्राणी - महान ब्रह्मा से लेकर एक तुच्छ चींटी तक - भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व द्वारा बनाए जा रहे हैं। एको बहुनाम यो विदधाति कामन। एकमात्र सर्वोच्च सत्ता, कृष्ण, सभी को बनाए रखते हैं। हमारे आय के तथाकथित स्रोत केवल हमारी अपनी पसंद हैं। अगर मैं एक शिकारी बनना चाहता हूं, तो ऐसा प्रतीत होगा कि शिकार करना मेरे रखरखाव का स्रोत है। अगर मैं एक ब्राह्मण बन जाता हूं और पूरी तरह से कृष्ण पर निर्भर रहता हूं, मैं कोई व्यवसाय नहीं करता, लेकिन फिर भी कृष्ण द्वारा मेरी आजीविका की आपूर्ति की जाती है। शिकारी अपने धनुष को तोड़ने के बारे में परेशान था क्योंकि वह अपनी आय के बारे में चिंतित था। नारद मुनि ने शिकारी को आश्वासन दिया क्योंकि वह जानते थे कि शिकारी को धनुष द्वारा नहीं बल्कि कृष्ण द्वारा बनाए रखा जा रहा था। कृष्ण के एजेंट होने के नाते, नारद मुनि अच्छी तरह से जानते थे कि शिकारी धनुष तोड़ने से पीड़ित नहीं होगा। इसमें कोई संदेह नहीं था कि कृष्ण उसे खाना देंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)