"प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।" (भगवद्गीता 3.27)
“प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव में आकर भ्रमित हो चुकी आत्मा अपने आप को उन कार्यों का कर्ता मानती है जोकि वास्तव में प्रकृति द्वारा ही किये जा रहे होते हैं।" (भगवद्गीता 3.27) प्रकृति के नियम बहुत सख्त होते हैं। किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि वह बेवजह जानवरों को मार सकता है और उसे इसका कोई अंजाम नहीं भुगतना पड़ेगा। वह इस तरह से सुरक्षित नहीं रह सकता। यहाँ पर नारद मुनि कहते हैं कि पशुवध एक बहुत ही घृणित कार्य है, खास तौर पर तब जब पशु को अनावश्यक रूप से कष्ट दिया जाता है। मांसाहारियों और पशुवध करने वालों को यह सलाह दी जाती है कि वह बूचड़खाने से मांस न खरीदें। वह महीने में एक बार काली माँ की पूजा करके किसी अच्छे जानवर की बलि दे सकते हैं और उसका मांस खा सकते हैं। इस तरीके को अपनाने के बाद भी व्यक्ति गलतकार ही बने रहेंगे।
