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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 250
 
 
श्लोक  2.24.250 
व्याध तुमि, जीव मार - ‘अल्प’ अपराध तोमार ।
कदर्थना दिया मा र’ - ए पाप ‘अपार’ ॥250॥
 
 
अनुवाद
नारद मुनि ने आगे कहा, 'हे मेरे शिकारी, तुम्हारा काम जानवरों को मारना है। यह तुम्हारा एक छोटा-सा अपराध है। लेकिन जब तुम जानबूझकर उन्हें अधमरा छोड़कर अनावश्यक पीड़ा देते हो, तो तुम्हें बहुत बड़ा पाप लगता है।'
 
"Narada Muni continued, 'O hunter, your job is to kill animals. This is a minor offense. But when you deliberately leave them half dead and cause them unnecessary suffering, you commit a grave sin.'"
तात्पर्य
अनिमल किलर लोगों के लिए यह एक और अच्छा उपदेश है। मानवीय समाज में हमेशा से ही पशुवध और मांसाहार रहा है क्योंकि कम सभ्य लोग मांस खाने के आदी होते हैं। वैदिक संस्कृति में मांसाहारियों को यह हिदायत दी जाती है कि वह किसी देवी-देवता जैसे काली या किसी देवता की बलि चढ़ा कर पशुवध करें। इसका मकसद पशु को अकारण पीड़ा न पहुँचाना है जैसा कि बूचड़खाने में किया जाता है। बलिदान के समय देवता को बलि देने वाले पशु के गले पर एक ही वार से प्रहार किया जाता है। यह कार्य अमावस्या की रात में ही किया जाना चाहिए और बलिदान के समय पशु के मुँह से निकलने वाली दर्द भरी आवाज किसी को नहीं सुनाई देनी चाहिए। इसके अतिरिक्त भी कई सारी पाबंदियाँ हैं। पशुवध की अनुमति महीने में एक बार ही मिलती है और वध करने वाला पशु अगले जन्म में उसी तरह का कष्ट भोगता है। वर्तमान समय में तथाकथित सभ्य लोग किसी धार्मिक या अनुष्ठानिक तरीके से देवता को पशु बलि नहीं देते। वह बिना किसी वजह के, महज अपनी जीभ के स्वाद के लिए, जानबूझ कर हजारों की संख्या में पशुओं का वध करते हैं। इसी कारण से पूरी दुनिया को तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। राजनेता अकारण ही युद्धों की घोषणा करते हैं और प्रकृति के कठोर नियमों के तहत देशों के बीच में व्यापक हत्याकांड हो रहा है।

"प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।" (भगवद्गीता 3.27)

“प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव में आकर भ्रमित हो चुकी आत्मा अपने आप को उन कार्यों का कर्ता मानती है जोकि वास्तव में प्रकृति द्वारा ही किये जा रहे होते हैं।" (भगवद्गीता 3.27) प्रकृति के नियम बहुत सख्त होते हैं। किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि वह बेवजह जानवरों को मार सकता है और उसे इसका कोई अंजाम नहीं भुगतना पड़ेगा। वह इस तरह से सुरक्षित नहीं रह सकता। यहाँ पर नारद मुनि कहते हैं कि पशुवध एक बहुत ही घृणित कार्य है, खास तौर पर तब जब पशु को अनावश्यक रूप से कष्ट दिया जाता है। मांसाहारियों और पशुवध करने वालों को यह सलाह दी जाती है कि वह बूचड़खाने से मांस न खरीदें। वह महीने में एक बार काली माँ की पूजा करके किसी अच्छे जानवर की बलि दे सकते हैं और उसका मांस खा सकते हैं। इस तरीके को अपनाने के बाद भी व्यक्ति गलतकार ही बने रहेंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)