| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ » श्लोक 197 |
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| | | | श्लोक 2.24.197  | अकामः सर्व - कामो वा मोक्ष - काम उदार - धीः ।
तीव्रण भक्ति - योगेन यजेत पुरुषं परम् ॥197॥ | | | | | | | अनुवाद | | “‘चाहे कोई सबकुछ चाहे या कुछ भी न चाहे, या चाहे वह भगवान के अस्तित्व में विलीन होना चाहे, वह तभी बुद्धिमान है जब वह भगवान कृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा करके पूजा करता है।’ | | | | “Whether one is desirous or aspiring or desiring to become one with the Lord, he is wise only if he worships the Supreme Personality of Godhead, Krishna, with transcendental loving devotion.” | | ✨ ai-generated | | |
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