श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 182
 
 
श्लोक  2.24.182 
कृष्ण - भक्त - दुःख - हीन, वाञ्छान्तर - हीन ।
कृष्ण - प्रेम - सेवा - पूर्णानन्द - प्रवीण ॥182॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण का भक्त कभी भी दुःखी नहीं होता, न ही उसकी कृष्ण की सेवा के अतिरिक्त कोई अन्य इच्छा होती है। वह अनुभवी और उन्नत होता है। वह कृष्ण के प्रेम के दिव्य आनंद का अनुभव करता है और सदैव पूर्णतः उनकी सेवा में लगा रहता है।"
 
"A devotee of Krishna is never in a state of sorrow, nor does he have any other desire than to serve Krishna. He is experienced and elevated. He experiences the transcendental bliss of Krishna-love and is completely engaged in His service."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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