श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 160
 
 
श्लोक  2.24.160 
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्व - सङ्कल्प - सन्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ॥160॥
 
 
अनुवाद
“‘जब कोई व्यक्ति इंद्रिय संतुष्टि के लिए कार्य करने में रुचि नहीं रखता है और जब वह सभी भौतिक इच्छाओं का त्याग करता है, तो उसे पूर्ण योग [योगारूढ़] में स्थित कहा जाता है।’
 
“When a man has no interest in performing actions for sense gratification and has renounced all material desires, he is said to be in Yoga.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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