श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  2.24.135 
निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः ।
मुक्तिर्हित्वान्यथा - रूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥135॥
 
 
अनुवाद
"जब भगवान लेटते हैं और ब्रह्मांडीय जगत को नष्ट कर देते हैं, तो जीव और अन्य शक्तियाँ महाविष्णु में विलीन हो जाती हैं। मोक्ष का अर्थ है परिवर्तनशील स्थूल और सूक्ष्म शरीरों का त्याग करके अपने शाश्वत, मूल स्वरूप में स्थित होना।"
 
"When Mahavishnu rests and destroys the vast universe, all living entities and other energies merge into Him. Liberation means remaining in one's eternal original form after abandoning the changing gross and subtle bodies."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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