देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।
"जैसे शरीर में रहने वाली आत्मा लगातार इस शरीर में लड़कपन से युवावस्था में और फिर बुढ़ापे में प्रवेश करती है, उसी तरह आत्मा मृत्यु के समय दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। एक समझदार व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से चकित नहीं होता है।"
जीवन के वास्तविक विज्ञान को न जानते हुए, एक मूर्ख व्यक्ति इस जीवन की अस्थायी गतिविधियों में उलझ जाता है और इस तरह जन्म और मृत्यु के चक्र में और अधिक उलझ जाता है। वह हमेशा भौतिक समृद्धि की इच्छा रखता है, जिसे कर्म, ज्ञान और योग द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन जब कोई वास्तव में भक्ति मंच तक ऊपर उठता है, तो वह इन सभी इच्छाओं को त्याग देता है। इसे अन्याभिलाषिता-शून्य कहा जाता है। तब व्यक्ति शुद्ध भक्त बन जाता है।
