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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  2.24.104 
साधु - सङ्ग, कृष्ण - कृपा, भक्तिर स्वभाव ।
ए तिने सब छाड़ाय, करे कृष्णे ‘भाव’ ॥104॥
 
 
अनुवाद
भक्त की संगति, कृष्ण की कृपा और भक्तिमय सेवा की प्रकृति मनुष्य को सभी अवांछनीय संगति त्यागने और धीरे-धीरे भगवद् प्रेम के स्तर तक उन्नति प्राप्त करने में सहायता करती है।
 
“The company of a saint, the grace of Krishna and the nature of devotion – these three help in renouncing all unwanted associations and respectively attaining the state of love for God.”
तात्पर्य
यह छंद शुद्ध भक्तों के संग, कृष्ण की दया और भक्ति-सेवा के महत्व पर विचार करता है। ये सभी व्यक्ति को अधर्मी लोगों के साथ मेलजोल छोड़ने और माया द्वारा दी गई भौतिक समृद्धि छोड़ने में मदद करते हैं। एक शुद्ध भक्त कभी भी भौतिक समृद्धि से आकर्षित नहीं होता है, क्योंकि वह समझता है कि भौतिक समृद्धि प्राप्त करने में समय बर्बाद करना मानव जीवन के उपहार का दुरुपयोग है। श्रीमद्-भागवतम में कहा गया है, श्रम एव ही केवलम्। एक भक्त की दृष्टि में, राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता, परोपकारी, दार्शनिक और मानवतावादी बस अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, क्योंकि उनके कार्य और प्रचार से मानव समाज जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं है। इन तथाकथित परोपकारियों, राजनेताओं और दार्शनिकों के पास कोई ज्ञान नहीं है क्योंकि वे नहीं जानते कि मृत्यु के बाद जीवन है। यह समझना कि मृत्यु के बाद जीवन है, आध्यात्मिक ज्ञान की शुरुआत है। एक व्यक्ति स्वयं को और वह क्या है, बस भगवद-गीता (2.13) के पहले पाठों को समझकर समझ सकता है:

देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।

"जैसे शरीर में रहने वाली आत्मा लगातार इस शरीर में लड़कपन से युवावस्था में और फिर बुढ़ापे में प्रवेश करती है, उसी तरह आत्मा मृत्यु के समय दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। एक समझदार व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से चकित नहीं होता है।"

जीवन के वास्तविक विज्ञान को न जानते हुए, एक मूर्ख व्यक्ति इस जीवन की अस्थायी गतिविधियों में उलझ जाता है और इस तरह जन्म और मृत्यु के चक्र में और अधिक उलझ जाता है। वह हमेशा भौतिक समृद्धि की इच्छा रखता है, जिसे कर्म, ज्ञान और योग द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन जब कोई वास्तव में भक्ति मंच तक ऊपर उठता है, तो वह इन सभी इच्छाओं को त्याग देता है। इसे अन्याभिलाषिता-शून्य कहा जाता है। तब व्यक्ति शुद्ध भक्त बन जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)