श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  2.23.77 
जीवेष्वेते वसन्तोऽपि बिन्दु - बिन्दुतया क्वचित् ।
परिपूर्णतया भान्ति तत्रैव पुरुषोत्तमे ॥77॥
 
 
अनुवाद
“ये गुण कभी-कभी जीवों में बहुत सूक्ष्म रूप से प्रदर्शित होते हैं, लेकिन वे भगवान के परम व्यक्तित्व में पूरी तरह से प्रकट होते हैं।”
 
“These qualities sometimes appear in subtle quantities in living beings, but they appear completely in the Supreme Personality of Godhead.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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