श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  2.23.67 
नायकानां शिरो - रत्नं कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
यत्र नित्यतया सर्वे विराजन्ते महा - गुणाः ॥67॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण स्वयं भगवान हैं और वे समस्त वीरों के शिरोमणि हैं। कृष्ण में समस्त दिव्य सद्गुण स्थायी रूप से स्थित हैं।"
 
"Krishna himself is the Supreme Personality of Godhead and the crown jewel of all heroes. All the transcendental qualities reside permanently in Krishna."
तात्पर्य
यह श्लोक भक्तिरसामृतसिंधु (2.1.17) में भी मिलता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)