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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.23.6 
ए दुइ, - भावेर ‘स्वरूप’, ‘तटस्थ’ लक्षण ।
प्रेमेर लक्षण एबे शुन, सनातन ॥6॥
 
 
अनुवाद
"भाव के दो अलग-अलग लक्षण हैं - स्वाभाविक और सीमांत। अब, हे मेरे प्रिय सनातन, प्रेम के लक्षणों को सुनो।
 
"Emotion has two distinct characteristics—natural and neutral. O Eternal One, now listen to me about the characteristics of love."
तात्पर्य
शब्द 'शुद्ध-सत्त्व-विशेषा त्मा ' का अर्थ है 'शुद्ध सद्गुण के पारलौकिक प्लेटफॉर्म पर स्थित।' इस तरह आत्मा सभी भौतिक संदूषणों से शुद्ध होती है, और इस स्थिति को स्वरूप-लक्षण कहा जाता है, भाव का संवैधानिक लक्षण, भावना। विभिन्न रुचियों द्वारा, किसी का हृदय नरम होता है, और भगवान की स्वतःस्फूर्त सेवा करने के लिए किसी की प्रेमपूर्ण प्रवृत्ति का जागरण होता है। इसे तटस्थ-लक्षण कहा जाता है, भाव का सीमांत लक्षण।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)