श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.23.51 
‘अनुभाव’ - स्मित, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर ।
स्तम्भादि - ‘सात्त्विक’ अनुभावेर भितर ॥51॥
 
 
अनुवाद
"उप-आनंद मुस्कुराना, नाचना और गाना है, साथ ही शरीर में विभिन्न अभिव्यक्तियाँ भी हैं। स्तब्ध होने जैसे प्राकृतिक आनंद को उप-आनंद [अनुभाव] माना जाता है।"
 
“Laughing, dancing, singing and various visible symptoms of the body come under Anubhava (subordinate feelings). Satvik feelings like Stambha etc. are considered under Anubhava.”
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd