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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.23.47 
प्रेमादिक स्थायि - भाव सामग्री - मिलने ।
कृष्ण - भक्ति रस - रूपे पाय परिणामे ॥47॥
 
 
अनुवाद
“जब स्थायी परमानंद [तटस्थता, दासत्व इत्यादि] को अन्य अवयवों के साथ मिश्रित किया जाता है, तो भगवान के प्रेम में भक्ति सेवा रूपांतरित हो जाती है और पारलौकिक मधुरता से निर्मित हो जाती है।
 
“When the permanent emotions (Shanta, Dasya, etc.) are mixed with other ingredients, then devotion to the Lord is transformed and filled with Rasas.”
तात्पर्य
भक्ति-रसामृत-सिंधु (2.1.4-5) में, निम्नलिखित परिभाषा दी गई है:

अथास्याः केशव-रेटरलक्षिताय निगद्यते

समग्रि-परिपोषेणपरमा रस-रूपता

विभावैर अनुभावैश्च चसात्त्विकैर व्यभिचारिभिः

स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामनिता श्रवणादिभिः

एषा कृष्ण-रतिः स्थिर्यभावो भक्ति-रसो भवेत्

“कृष्ण, केशव के प्रति प्रेम, जैसा कि पहले बताया गया है, जब उसके अवयवों की पूर्ति हो जाती है, तो वह मधुरता से युक्त होने की सर्वोच्च अवस्था तक पहुँच जाता है। विभाव, अनुभव, सात्विक और व्यभिचारी के माध्यम से, श्रवण और जप सक्रिय हो जाते हैं, और भक्त कृष्ण के प्रति प्रेम का स्वाद लेने में सक्षम हो जाता है। तब कृष्ण के प्रति लगाव, या स्थायी परमानंद (स्थयी-भाव), भक्ति सेवा (भक्ति-रस) की मधुरता बन जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)