श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.23.42 
प्रेमा क्रमे बा ड़ि’ हय - स्नेह, मान, प्रणय ।
राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय ॥42॥
 
 
अनुवाद
“ईश्वर प्रेम बढ़ता है और स्नेह, प्रतिप्रेम, प्रेम, आसक्ति, उपासक्ति, परमानंद और उदात्त परमानंद के रूप में प्रकट होता है।
 
“In this way, love for God increases and manifests itself in the form of affection, pride, love, passion, affection, emotion and great emotion.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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