श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.23.38 
कृष्णे ‘रतिर’ चिह्न एइ कैलुँ विवरण ।
‘कृष्ण - प्रेमेर’ चिह्न एबे शुन सनातन ॥38॥
 
 
अनुवाद
"ये उस व्यक्ति के लक्षण हैं जिसने कृष्ण के प्रति आकर्षण [भाव] विकसित कर लिया है। अब मैं उस व्यक्ति के लक्षणों का वर्णन करता हूँ जो वास्तव में कृष्ण प्रेम में उन्नत हो गया है। हे सनातन, कृपया इसे मुझसे सुनें।
 
"These are the characteristics of one who has developed attraction (bhaav) for Krishna. Now let me tell you the characteristics of one who has truly attained Krishna-love. O eternal one, listen to me."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)