श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.23.26 
‘सर्वोत्त म’ आपनाके ‘हीन’ करि माने ॥26॥
 
 
अनुवाद
“यद्यपि शुद्ध भक्त का स्तर सबसे ऊँचा होता है, फिर भी वह स्वयं को जीवन की सबसे निम्न अवस्था में मानता है।
 
“Although the pure devotee is of the highest stature, he still considers himself the lowest of all.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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