श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.23.20 
एइ नव प्रीत्यङ्कुर याँर चित्ते हय ।
प्राकृत - क्षोभे ताँर क्षोभ नाहि हय ॥20॥
 
 
अनुवाद
“यदि किसी के हृदय में कृष्ण के प्रति प्रेम अंकुर रूप में फलित हो गया है, तो वह भौतिक वस्तुओं से विचलित नहीं होता।
 
“If love for Krishna sprouts in one's heart, he is not disturbed by material things.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)