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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  2.23.14-15 
आदौ श्रद्धा ततः साधु - सङ्गोऽथ भजन - क्रिया ।
ततोऽनर्थ - निवृत्तिः स्यात्ततो निष्ठा रुचिस्ततः ॥14॥
अथासक्तिस्त तो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति ।
साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत्क्रमः ॥15॥
 
 
अनुवाद
"आरंभ में श्रद्धा होनी चाहिए। फिर व्यक्ति शुद्ध भक्तों की संगति में रुचि लेता है। तत्पश्चात व्यक्ति गुरु द्वारा दीक्षित होता है और उनके आदेशानुसार विधि-विधानों का पालन करता है। इस प्रकार व्यक्ति सभी अवांछित आदतों से मुक्त हो जाता है और भक्ति में दृढ़तापूर्वक स्थित हो जाता है। तत्पश्चात, व्यक्ति में रुचि और आसक्ति विकसित होती है। यही साधना-भक्ति का मार्ग है, विधि-विधानों के अनुसार भक्ति का पालन। धीरे-धीरे भावनाएँ तीव्र होती जाती हैं, और अंततः प्रेम का जागरण होता है। यह कृष्णभावनामृत में रुचि रखने वाले भक्त के प्रति भगवान के प्रेम का क्रमिक विकास है।"
 
"First of all, there must be faith. Then a person begins to show interest in the association of pure devotees. Then he is initiated by a guru and follows the rituals as instructed by him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)