| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम » श्लोक 121 |
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| | | | श्लोक 2.23.121  | तुमि ये कहिला, एइ सिद्धान्तामृत - सिन्धु ।
मोर मन छुइँते नारे इहार एक - बिन्दु ॥121॥ | | | | | | | अनुवाद | | "आपने जो निष्कर्ष मुझे बताए हैं, वे सत्यरूपी अमृतसागर हैं। मेरा मन उस सागर की एक बूँद तक भी पहुँचने में असमर्थ है।" | | | | "The principles you have told me are an ocean of truth, an ocean of nectar. My mind is incapable of touching even a drop of that ocean." | | ✨ ai-generated | | |
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