श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.23.12 
रुचि हैते भक्त्ये हय ‘आसक्ति’ प्रचुर ।
आसक्ति हैते चित्ते जन्मे कृष्णे प्रीत्यङ्कुर ॥12॥
 
 
अनुवाद
“स्वाद जागृत होने के बाद, एक गहन आसक्ति उत्पन्न होती है, और उस आसक्ति से हृदय में कृष्ण के प्रति प्रेम का बीज विकसित होता है।
 
“When interest is awakened, deep attachment arises and from that attachment the seed of love for Krishna germinates in the heart.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)