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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  2.23.109 
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गत - व्यथः ।
सर्वारम्भ - परित्यागी यो मे भक्तः स मे प्रियः ॥109॥
 
 
अनुवाद
'जो भक्त दूसरों पर आश्रित नहीं है, केवल मुझ पर आश्रित है, जो भीतर और बाहर से शुद्ध है, जो निपुण है, भौतिक वस्तुओं से उदासीन है, चिंतारहित है और सभी दुखों से मुक्त है, तथा जो सभी पवित्र और अपवित्र कार्यों का त्याग करता है, वह मुझे बहुत प्रिय है।
 
“The devotee who relies solely on Me, without depending on anyone else, who is pure within and without, who is skillful, who is indifferent to material things, who is carefree, who is free from all sufferings, and who renounces all pious and sinful activities, is very dear to Me.”
तात्पर्य
अनपेक्ष शब्द का अर्थ है कि सांसारिक लोगों की चिन्ता नहीं करनी चाहिए और उन पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। केवल भगवान के व्यक्तित्व पर निर्भर रहना चाहिए और भौतिक इच्छाओं से मुक्त होना चाहिए। व्यक्ति को भीतर और बाहर दोनों तरफ से स्वच्छ रहना चाहिए। बाहरी रूप से स्वच्छ रहने के लिए नियमित रूप से साबुन और तेल से स्नान करना चाहिए और आंतरिक रूप से स्वच्छ रहने के लिए हमेशा कृष्ण के विचारों में तल्लीन रहना चाहिए। सर्वारंभ-परित्यागी शब्द बताते हैं कि तथाकथित स्मार्त-विधि के पवित्र और अपवित्र कर्मों में रुचि नहीं होनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)