श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  2.23.102 
पूर्वे प्रयागे आमि रसेर विचारे ।
तोमार भाइ रूपे कैलुँ शक्ति - सञ्चारे ॥102॥
 
 
अनुवाद
"पहले मैंने आपके भाई रूप गोस्वामी को इन रागों को समझने की शक्ति दी थी। प्रयाग के दशश्र्वमेधघाट में उन्हें उपदेश देते हुए मैंने ऐसा किया था।"
 
Before this, I have already given the power to understand these rasas to your brother Rupa Goswami.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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