‘श्रद्धा’ - शब्दे - विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय ।
कृष्ण भक्ति कैले सर्व - कर्म कृत हय ॥62॥
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अनुवाद
"श्रद्धा वह दृढ़ विश्वास है कि कृष्ण की दिव्य प्रेममयी सेवा करने से व्यक्ति स्वतः ही सभी गौण कर्म कर लेता है। ऐसी श्रद्धा भक्तिमय सेवा के लिए अनुकूल होती है।"
"By rendering divine loving devotion to Krishna, one automatically accomplishes all secondary duties. Such firm determination is called faith. Such faith proves conducive to the accomplishment of devotional service."
तात्पर्य
दृढ़ विश्वास और भरोसा श्रद्धा कहलाता है। जब कोई भगवान की भक्ति करते हैं, तब यह समझा जाता है कि उन्होंने सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाया है। उन्होंने अपने पूर्वजों, साधारण प्राणियों और देवताओं को संतुष्ट कर लिया है और सभी जिम्मेदारियों से मुक्त हैं। ऐसे व्यक्ति को अलग से अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने की आवश्यकता नहीं होती है। यह स्वतः ही हो जाता है। निष्काम कर्म (कर्म) का उद्देश्य आत्मा की इंद्रियों को संतुष्ट करना है। हालाँकि, जब कोई कृष्ण चेतना के लिए जागता है, तो उसे पवित्र गतिविधि के लिए अलग से काम करने की आवश्यकता नहीं होती है। सभी निष्काम गतिविधियों की सर्वोत्तम उपलब्धि सांसारिक जीवन से वैराग्य है, और इस वैराग्य को भगवान की सेवा में दृढ़ता से लगे भक्त द्वारा अनायास ही प्राप्त किया जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥