श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.22.54 
‘साधु - सङ्ग’, ‘साधु - सङ्ग’ - सर्व - शास्त्रे कय ।
लव - मात्र साधु - सङ्गे सर्व - सिद्धि हय ॥54॥
 
 
अनुवाद
“सभी शास्त्रों का यह मत है कि शुद्ध भक्त के साथ क्षण भर की संगति से भी मनुष्य समस्त सफलता प्राप्त कर सकता है।
 
“All the scriptures declare that a man can attain all success by even a moment's association with a pure devotee.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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