श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.22.53 
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाड्छि स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः ।
महीयसां पाद - रजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥53॥
 
 
अनुवाद
"जब तक मानव समाज महान महात्माओं के चरणकमलों की धूलि को स्वीकार नहीं करता - ऐसे भक्त जिनका भौतिक संपत्ति से कोई लेना-देना नहीं है - तब तक मानवजाति कृष्ण के चरणकमलों की ओर अपना ध्यान नहीं लगा सकती। वे चरणकमल भौतिक जीवन की सभी अवांछित, दयनीय स्थितियों का नाश करते हैं।"
 
"Until human society accepts the dust from the feet of the great souls—devotees who have no attachment to material possessions—humankind cannot turn its attention to the feet of Lord Krishna. Those feet are the removers of all unwanted sufferings of material life."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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