श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 154
 
 
श्लोक  2.22.154 
विराजन्तीमभिव्यक्तां व्रज - वासि - जनादिषु ।
रागात्मिकामनुसृता य़ा सा रागानुगोच्यते ॥154॥
 
 
अनुवाद
"वृन्दावनवासियों द्वारा सहज प्रेम में की गई भक्ति सेवा को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त और प्रकट किया गया है। उनकी भक्ति सेवा के अनुरूप की गई भक्ति सेवा को रागानुगा भक्ति कहा जाता है, अर्थात सहज प्रेममयी सेवा के बाद की जाने वाली भक्ति सेवा।"
 
"The residents of Vrindavana witness the living expression and manifestation of devotion performed out of spontaneous love. The devotion that matches the devotion of the residents of Vrindavana is called raganuga bhakti, that is, devotion that occurs when spontaneous love is awakened."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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